।।दोहा।।
मंगलमय गिरिजा सुवन, पणवहुं बारम्बार।
विघ्नहरण मंगल करण, कर भवसागर पार।।
।।चौपाई।।
लम्बोदर जय बाहु विशाला। कर,कंकण मुक्तामणि माला।।
मस्तक पर त्रिमुंड भल सोहे। अंकुश धरे हाथ पर मोहे।।
नख द्युति दमके जैसे सिध्दि। बनी रहै दासी नित रिध्दि।।
गजसम देह गजानन भावै। मोदक कर में भोग लगावै।।
चँवर डुलावै रिध्दि-सिध्दि प्रहरी। बाहन भागै मूसक लहरी।।
नित उठी ध्यान धरै त्रिलोकी। प्रथम पूज्य बन्दे सुरलोकी।।
इच्छा भई उमा के भारी। पुत्र होइ इक अति बलधारी।।
शिव आदेश करयो तप भारी। होइ है निश्चय पुत्र सुखारी।।
बहुत दिवस बीते तप कीन्हे। विष्णुप्रसन्न होय वर
दीन्हे।।
होइ पुत्र हरि का अवतारा। पूजनीय सुरगण का प्यारा।।
एक दिवस जब शैलकुमारी। उबटन करि निज मैल उतारी।।
सो समेटि इक बाल बनायो। देखि देखि जिय अति हरषायो।।
निज उंगली कर रक्त निकारा। एक बून्द शिशु के मुख डारा।।
पीवा रक्त सजीव रूप धर। अरुण प्रभा सा चमका सुरवर।।
जोरे हाथ दण्डवत कीन्हा। पार्वती लगाई उर लीन्हा।।
शीश नाइ पुनि वचन उचारा। मैं जननी हूँ दास तिहारा।।
सूरन दुन्दुभी दोन्ह बजाई। शिव गदगद होइ गोद उठाई।।
वह बालक अतुलित बलशाली। शिव संग किन्हीं अतिरण लीला।।
वेद व्यास जब राच्यों वेदा। करी दया खोल्यो सब भेदा।।
शारद नारद शीश नवावे। ब्रह्म्मादिक मुनि पार न पावे।।
पंच देव मंह देव प्रथम ही। नाम लिये सब संकट कटही।।
तुम्हरो तेज सकै को रोकी। पूजै एक दिन प्रथम त्रिलोकी।।
परशुराम जब रोश बड़ायहु। धीरज दै गम्भीर बना यहु।।
नाना विधि कर रूप बनाये। तीन लोक सर्वस्व नचाये।।
जन्म तिथि चतुर्थी पुण्य की। भादो मास शुक्ल पक्ष की।।
यह तिथि अतिशय पुण्य समाना। रामनाम गुण की रति गाना।।
सुरनर योगी भेद न जाना। पंचदेव में प्रथमे माना।।
हे प्रभुमोपर कीजे दया। कोटि विघ्न छिन्नमाहिनसाया।।
वनधु नाथ जुगल कर जोरी। सुनि लीजै प्रभुअर्जी मोरी।।
ध्यान धरे जो कोई निश दिन। दीजे बल विद्या धन सब दिन।।
महिमा अकथ कहौ का भाई। मूढ मती बुधि थोरी पाई।।
जय जय जय शंकर जगदीशा। जय जय जय गणश अवनिशा।।
करि विशवास जपे धरि श्रद्धा। कृष्ण चतुर्थी पूरे बरसा।।
पूजै विधिवत सब दिन नेमा। ताकर हरहि कष्ट सब क्षण मा।।
चन्द्रोदय प्रथमे करि दर्शन। पुनि प्रसाद बाटें सब भोजन।।
गौर तनय कथा मन लाई। प्रेम सहित पूजन करवाई।।
कथा कीर्तन आदि सप्रेमा। पूजै गणपति सब दिन नेमा।।
पुत्र होनकर इच्छा करही। गणपति कृपा अवशि फल लहहिं।।
शिवशंकर पुजै देवालय। कलश प्रतिष्ठा करे शिवालय।।
उद्यापन मण्डप करवावे। होइ मुक्त अमर पद पांवै।।
छुटै आवागमन कलेशा। जो पूजाहि गणपति हमेशा।।
।। दोहा ।।
श्रद्धा भक्ति समेत निज, जौ पूजै चितलाय।
करै कृपा गिरजा सुवन, कोटिक पाप नसाय।।
।। इति श्री गणेश चालीसा समाप्त ।।

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