श्रीरामचरितमानस चोपाइ नित्य पाठ

 श्रीरामचरितमानस चोपाइ नित्य पा


श्रीरामचरितमानस चोपाइ नित्य पाठ

🙏 कृपया रामायण समय निकालकर अवश्य पढ़े।

🌷सियावर राम जय जय राम

🌷मेरे प्रभु राम जय जय राम

🌷करो कल्याण जय जय राम

🌷मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी

🌷रघुनंदन राघव राम हरे सियाराम हरे सियाराम हरे।

🌷कवन सो काज कठिन जग माही जो नहीं होई तात तुम पाही।

🌷दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी।

🌷श्री राम जय राम जय जय राम।

🌷श्री राम जय राम जय जय राम।

🌷सियावर श्रीरामचन्द्र की जय।

🌷राधावर श्रीकृष्ण भगवान की जय

🌷गोंरावर भोलेनाथ की जय।

🌷पवनसुत हनुमान की जय।

🌷श्री राम दरबार की जय।

🌷बालाजी सालासर धाम की जय।


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होहु सँजोइल रोकहु घाटा । ठाटहु सकल मरै के ठाटा ॥

सनमुख लोह भरत सन लेऊँ । जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ ।।


🌷 सुसज्जित होकर घाटोंको रोक लो और सब लोग मरनेके साज सजा लो (अर्थात् भरतसे युद्धमें लड़कर मरनेके लिये तैयार हो जाओ)। मैं भरतसे सामने (मैदानमें) लोहा लूँगा (मुठभेड़ करूँगा) और जीते-जी उन्हें गङ्गापार न उतरने दूँगा ॥ १ ॥


समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा । राम काजु छनभंगु सरीरा ॥

भरत भाइ नृपु मैं जन नीचू। बड़े भाग असि पाइअ मीचू॥


🌷 युद्धमें मरण, फिर गङ्गाजीका तट, श्रीरामजीका काम और क्षणभङ्गुर शरीर (जो चाहे जब नाश हो जाय); भरत श्रीरामजीके भाई और राजा (उनके हाथसे मरना) और मैं नीच सेवक-बड़े भाग्यसे ऐसी मृत्यु मिलती है ॥ २ ॥


अयोध्याकाण्ड ४८५


स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी ।।

तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें।।


🌷 मैं स्वामीके कामके लिये रणमें लड़ाई करूँगा और चौदहों लोकोंको अपने यशसे उज्ज्वल कर दूँगा। श्रीरघुनाथजीके निमित्त प्राण त्याग दूँगा। मेरे तो दोनों ही हाथोंमें आनन्दके लड्डू है (अर्थात् जीत गया तो रामसेवकका यश प्राप्त करूँगा और मारा गया तो श्रीरामजीकी नित्य सेवा प्राप्त करूंगा) ॥ ३ ॥


साधु समाज न जाकर लेखा । राम भगत महुँ जासु न रेखा ।।

जायँ जिअत जग सो महि भारू । जननी जौबन बिटप कुठारू ।।


🌷 साधुओंके समाजमें जिसकी गिनती नहीं और श्रीरामजीके भक्तोंमें जिसका स्थान नहीं, वह जगत्‌ये पृथ्वीका भार होकर व्यर्थ ही जीता है। वह माताके यौवनरूपी वृक्षके काटनेके लिये कुल्हाड़ामात्र है ॥ ४ ॥


दो०- बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु । सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु ॥ १९० ॥


🌷 [ इस प्रकार श्रीरामजीके लिये प्राणसमर्पणका निश्चय करके] निषादराज विषादसे रहित हो गया और सबका उत्साह बढ़ाकर तथा श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकस, धनुष और कवच माँगा ॥ १९० ॥


बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।।

भलेहि नाथ सब कहहिं सहरषा । एकहिं एक बढ़ावइ करषा।।


🌷 [उसने कहा- ] हे भाइयो ! जल्दी करो और सब सामान सजाओ। मेरी आज्ञा सुनकर कोई मनमें कायरता न लावे। सब हर्षके साथ बोल उठे- हे नाथ! बहुत अच्छा और आपसमें एक-दूसरेका जोश बढ़ाने लगे ॥ १ ॥


चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।।

सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भार्थी बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं।।


🌷 निषादराजको जोहार कर-करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राममें लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंकी जूतियोंका स्मरण करके उन्होंने भाथियाँ (छोटे-छोटे तरकस) बाँधकर धनुहियों (छोटे-छोटे धनुषों) पर प्रत्यञ्चा चढ़ायीं ॥ २ ॥


अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं।।

एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहिं गगन मनहुँ छिति छाँड़े ।।


४८६ * रामचरितमानस


🌷 कवच पहनकर सिरपर लोहेका टोप रखते हैं और फरसे, भाले तथा बरछोंको सीधा कर रहे हैं (सुधार रहे हैं)। कोई तलवारके वार रोकनेमें अत्यन्त ही कुशल हैं। वे ऐसे उमंगमें भरे हैं, मानो धरती छोड़कर आकाशमें कूद (उछल) रहे हों ॥ ३ ॥


निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई।।

देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने ।।


🌷 अपना-अपना साज-समाज (लड़ाईका सामान और दल) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुहको जोहार की। निषादराजने सुन्दर योद्धाओंको देखकर, सबको सुयोग्य जाना और नाम ले-लेकर सबका सम्मान किया ॥ ४ ॥


दो० - भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि । सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि ।। १९१ ॥


🌷 [ उसने कहा- हे भाइयो ! धोखा न लाना (अर्थात् मरनेसे न घबड़ाना), आज मेरा बड़ा भारी काम है। यह सुनकर सब योद्धा बड़े जोशके साथ बोल उठे- हे वीर ! अधीर मत हो ॥ १९१ ॥


राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे ।।

जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं।


🌷 हे नाथ ! श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे और आपके बलसे हमलोग भरतकी सेनाको बिना वीर और बिना घोड़ेकी कर देंगे (एक-एक वीर और एक-एक घोड़ेको मार डालेंगे) । जीते-जी पीछे पाँव न रक्खेंगे। पृथ्वीको रुण्ड-मुण्डमयी कर देंगे (सिरों और धड़ोंसे छा देंगे) ॥ १ ॥


दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू।।

एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।।


🌷 निषादराजने वीरोंका बढ़िया दल देखकर कहा- जुझाऊ (लड़ाईका) ढोल बजाओ। इतना कहते ही बायीं ओर छींक हुई। शकुन विचारनेवालोंने कहा कि खेत सुन्दर हैं (जीत होगी) ॥ २ ॥


बूढ़ एकु कह सगुन बिचारी । भरतहि मिलिअ न होइहि रारी।।

रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं।।


🌷 एक बूढ़ेने शकुन विचारकर कहा- भरतसे मिल लीजिये, उनसे लड़ाई नहीं होगी। भरत श्रीरामचन्द्रजीको मनाने जा रहे हैं। शकुन ऐसा कह रहा है कि विरोध नहीं है ॥ ३ ॥


सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा । सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा।।

भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।


अयोध्याकाण्ड ४८७


🌷 यह सुनकर निषादराज गुहने कहा- बूढ़ा ठीक कह रहा है। जल्दीमें (बिना विचारे) कोई काम करके मूर्खलोग पछताते हैं। भरतजीका शील स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करनेमें हितकी बहुत बड़ी हानि है ॥ ४ ॥


दो०- गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ । बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ ।। १९२ ॥


🌷 अतएव हे वीरो ! तुम लोग इक‌ट्ठे होकर सब घाटोंको रोक लो, मैं जाकर भरतजीसे मिलकर उनका भेद लेता हूँ। उनका भाव मित्रका है या शत्रुका या उदासीनका, यह जानकर तब आकर वैसा (उसीके अनुसार) प्रबन्ध करूँगा ॥ १९२॥


लखब सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ ।।

अस कहि भेंट सँजोवन लागे । कंद मूल फल खग मृग मागे।।


🌷 उनके सुन्दर स्वभावसे मैं उनके स्नेहको पहचान लूँगा। वैर और प्रेम छिपानेसे नहीं छिपते । ऐसा कहकर वह भेटका सामान सजाने लगा। उसने कन्द, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाये ॥ १ ॥


मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने ।।

मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।।


🌷 कहार लोग पुरानी और मोटी पहिना नामक मछलियोंके भार भर-भरकर लाये। भेटका सामान सजाकर मिलनेके लिये चले तो मङ्गलदायक शुभ-शकुन मिले ॥ २ ॥


देखि दूरि तें कहि निज नामू । कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू ।।

जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा । भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा ।।


🌷 निषादराजने मुनिराज वसिष्ठजीको देखकर अपना नाम बतलाकर दूरहीसे दण्डवत्-प्रणाम किया। मुनीश्वर वसिष्ठजीने उसको रामका प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरतजीको समझाकर कहा [ कि यह श्रीरामजीका मित्र है] ॥ ३ ॥


राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा।।

गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई ।।


🌷 यह श्रीरामका मित्र है, इतना सुनते ही भरतजीने रथ त्याग दिया। वे रथसे उतरकर प्रेममें उमैंगते हुए चले। निषादराज गुहने अपना गाँव, जाति और नाम सुनाकर पृथ्वीपर माथा टेककर जौहार की ॥ ४ ॥


दो०- करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ । मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ ॥ १९३ ॥


४८८* रामचरितमानस


🌷 दण्डवत् करते देखकर भरतजीने उठाकर उसको छातीसे लगा लिया। हृदयमें प्रेम समाता नहीं है, मानो स्वयं लक्ष्मणजीसे भेंट हो गयी हो ॥ १९३ ॥


भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती॥

धन्य धन्य धुनि मंगल मूला । सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला ।।


🌷 भरतजी गुहको अत्यन्त प्रेमसे गले लगा रहे हैं। प्रेमकी रीतिको सब लोग सिहा रहे हैं (ईर्ष्यापूर्वक प्रशंसा कर रहे हैं); मङ्गलकी मूल 'धन्य-धन्य' की ध्वनि करके देवता उसकी सराहना करते हुए फूल बरसा रहे हैं ॥ १ ॥


लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा । जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।

तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता । मिलत पुलक परिपूरित गाता।।


🌷 [ वे कहते हैं] जो लोक और वेद दोनोंमें सब प्रकारसे नीचा माना जाता है, जिसकी छायाके छू जानेसे भी स्नान करना होता है, उसी निषादसे अँकवार भरकर (हृदयसे चिपटाकर) श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई भरतजी [ आनन्द और प्रेमवश शरीरमें पुलकावलीसे परिपूर्ण हो मिल रहे हैं ॥ २ ॥


राम राम कहि जे जमुहाहीं । तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ।।

यह तौ राम लाइ उर लीन्हा । कुल समेत जगु पावन कीन्हा।।


🌷 जो लोग राम-राम कहकर जंभाई लेते हैं (अर्थात् आलस्यसे भी जिनके मुँहसे राम-नामका उच्चारण हो जाता है), पापोंके समूह (कोई भी पाप) उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुहको तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजीने हृदयसे लगा लिया और कुलसमेत इसे जगत्पावन (जगत्को पवित्र करनेवाला) बना दिया ॥ ३ ॥


करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई।

उलटा नामु जपत जगु जाना । बालमीकि भए ब्रह्म समाना ।।


🌷 कर्मनाशा नदीका जल गङ्गाजीमें पड़ जाता है (मिल जाता है), तब कहिये, उसे कौन सिरपर धारण नहीं करता ? जगत् जानता है कि उलटा नाम (मरा-मरा) जपते-जपते वाल्मीकिजी ब्रह्मके समान हो गये ॥ ४ ॥


दो० - स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात । रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात ॥ १९४ ॥


🌷 मूर्ख और पामर चाण्डाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात भी राम-नाम कहते ही परम पवित्र और त्रिभुवनमें विख्यात हो जाते हैं ॥ १९४ ॥


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🙏🙏:- नम्र याचना :-🙏🙏


🌷 मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुवीर । अस विचारि रघुवंश मणि, हरहु विषम भव पीर ।। 1 ।।


🌷 बार बार वर माँगहु - हरिषि देहु श्री रंग । पद सरोज अनपायनी, भक्ति सदा सत्संग ।। 2 ।।


🌷अर्थ न धर्म, का काम रुचि, गति न चहों निर्वाण । जन्म जन्म रति राम पद, यह वरदान न आन ।। ३।।


🌷स्वामी मोहि न विसारियो, लाख लोग मिलि जाहि । हम से तुम को बहुत हैं, तुम से हम को नाहि ।। 4 ।।


🌷 नांहि विद्या नंहि वाहुवल, नंहि खर्चन को दाम । मोह से पतित अपंग की, तुम पत राखहु राम ।। 5।।


🌷 श्रवण सुयश सुनि आयह, प्रभु भजन भवपीर । त्राहि त्रहि आरति हरण, शरण सुखद रघुवीर ।। 6 ।।


🌷 कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभिहि प्रिय जिमि दाम । तिमिहि रघुनाथा निरन्तर, प्रिय लागहु मोहि राम ।। 7 ।।


🌷 मैं अपराधी जन्म का, नत शिख भरा विकास । तुम दात दुख भंजना, मेरी सुनहु पुकार ।। 8 ।।


🌷 क्या मुख ले विनती करूँ, लाज लगत है मोहि । तुम देखत अबगुन कीए, कैसे भावु तोहि ।।9।।


🌷 जय जय कागभुशुण्डि की, जय गिरी उमा महेश। जय ऋषि भारद्वाज की, जय तुलसी अवधेश ।।10।।


🌷 बेनी सी पावन परम, देनी श्रीफल चारि। स्वर्ग नसेनी हरि कथा, नरक निवारि निहारि ।।11।।


🌷 कहेउ दंडवत प्रभुहि सन, तुमहि कहउँ कर जोरि। बार बार रघुनायकहि, सुरति करायहु मोरि ।।12।।


🌷 दीजै दीन दयाल मोहि, बड़ो दीन जन जान। चरण कमल को आसरो, सत संगति की बान ।।13।।


🌷 एक घड़ी आधी घड़ी, आधी मह पुनि आध। तुलसी चर्चा राम की, हरे कोटि अपराध ।।14 ।।


🌷 प्रनतपाल रघुवंश मनि, करुना सिन्धु खरारि। गहे सरन प्रभु राखिहैं, सब अपराध विसारि ।।15।।


🌷 राम चरन रति जो चहे, अथवा पद निर्वान। भाव सहित सो यह कथा, करे श्रवन पुट पान ।।16।।


🌷 मुनि दुर्लभ हरि भक्ति नर, पावहि बिनहि प्रयास। जो यह कथा निरंतर, सुनहि मानि विश्वास ।।17।।


🌷 कथा विसर्जन होत है, सुनउ वीर हनुमान। जो जन जंह से आए हैं, सो तंह करहि पयान ।।18।।


🌷 श्रोता सब आश्रम गए, शंभू गए कैलाश। रामायण मम हृदय मँह, सदा करहुँ तुम वास ।।19।।


🌷 रावणारि जसु पावन, गावहि सुनहि जे लोग। राम भगति दृढ़ पावहि, बिन बिराग जपजोग ।।20।।


🌷 राम लखन सिया जानकी, सदा करहुँ कल्याण। रामायण बैकुंठ की, विदा होत हनुमान ।।21।।


।। सियावर रामचंद्र की जय ।।


🌷 सब पर दया करो भगवान, सब का ....


सबका भला करो भगवान, सब पर दया करो भगवान, सब पर कृपा करो भगवान, सब का सब विधि कल्याण हो , धर्म की जय, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद भावना हो, विश्व का कल्याण हो।


🌷सियावर राम जय जय राम

🌷मेरे प्रभु राम जय जय राम

🌷करो कल्याण जय जय राम

🌷मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी

🌷रघुनंदन राघव राम हरे सियाराम हरे सियाराम हरे।

🌷कवन सो काज कठिन जग माही जो नहीं होई तात तुम पाही।

🌷दीन दयाल बिरिदु संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी।

🌷श्री राम जय राम जय जय राम।

🌷श्री राम जय राम जय जय राम

🌷सियावर श्रीरामचन्द्र की जय

🌷राधावर श्री कृष्ण भगवान की जय

🌷गोंरावर भोलेनाथ की जय

🌷पवनसुत हनुमान की जय

🌷श्री राम दरबार की जय

🌷हारे के सहारे की जय

🌷सब भक्तन की जय

🌷सब सन्तन की जय

🌷गऊ माता की जय

🌷गंगा माता की जय

🌷भारत माता की जय


मंत्र

 मंत्र 






























सनातनी 15 मंत्र

 सनातनी 15 मंत्र


















































श्री रामचरितमानस की 8 दिव्य चौपाइयां

 श्री रामचरितमानस की 8 दिव्य चौपाइयां