किसान की समस्या

किसान अपनी समस्याओं को ले कर जब नुक्कड़-चौराहों पर धरने देते थे तब मीडिया वाले किसानों की फ़ोटो अख़बार के फ्रंट पेज पर छापते थे।
आज जब किसान 11,000 रूपये/क्विंटल के चने ख़रीद कर बोता है और मण्डी में 4,500 या 5,000 रूपये/क्विंटल में अपनी उपज बेचता है तो सारे मीडिया वाले अख़बारों में केवल "सबका साथ,सबका विकास" ही छापते हैं
कुछ तो शर्म करो आपको लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है
अगर पंचायत सचिव को वेतन बढ़वाना हो तो हड़ताल करवा कर वेतन बढ़ा लेते हैं,पटवारियों को अतिरिक्त कार्यभार सौंपा जाता है तो हड़ताल करा के अपनी मांगें मनवा लेते हैं
विधायक और सांसद अपने आप ही वेतन बढ़ा लेते हैं,शिक्षक स्कूलों में ना जा कर अपनी मांगें मनवा लेते हैं
और किसान जब फ़सल बेचने मण्डी में जाता है तो व्यापारियों द्वारा हाथ में चेक थमा कर कह दिया जाता है कि,बैंक में चले जाओ और बैंक का अधिकारी कहता है कि, 10-20 दिन बाद आना
बेचारा किसान किसी दूसरे के ट्रैक्टर से यदि अपनी उपज बेचने ले जाता है तो उसे मण्डी तक का किराया-भाड़ा भी किसी पैसे वाले से उधार ले कर चुकाना पड़ता है
यदि ट्रैक्टर की किश्त भरने में चार दिन की ही देरी कर दी तो बैंक वाले पेनल्टी(लेट फ़ीस) का हवाला दे कर ग़रीब किसान से मोटी रकम वसूल लेते हैं।

इस देश में किसान का नाम जवान के साथ जोड़ा जाता है और दोनों की हालत आपके और हमारे सामने हैं।

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