करौंदा (करमदा) पर अभी फलो की बहार हैं ।
करौंदा को संस्कृत में करमर्द, सुखेण, कृष्णापाक फल कहा गया है वही इसे मरवन्दी, करौंदी, करमंदी, करकचा, बाका आदि अलग अलग नामो से जाना जाता है ।
मालवांचल में इसे करमदा कहा जाता हैं।
करौंदा का वृक्ष झाड़दार जाति का होता है उसमें कांटे होते हैं ।
आम घरों में करौंदा सब्जी, चटनी, मुरब्बे और अचार के लिए प्रचलित है ।
जंगलों, खेत खलियानों के आस-पास कँटीली झाडियों के रूप में करौंदा प्रचुरता से उगता हुआ पाया जाता है ।
यह खेत की मेड़ पर लगाने से फसलो को जानवरो से नुकसान नही होता ।
हालाँकि करौंदे के पेड़ पहाडी देशों में ज्यादा होते हैं और कांटे भी होते है ।
यह पौधा भारत में राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश ,मध्यप्रदेश और हिमालय के क्षेत्रों में बहुतायत पाया जाता है ।
यह नेपाल और अफ़ग़ानिस्तान में भी पाया जाता है।
इसके दो साल के पौधे में फल आने लगते हैं । और फूल आना फरवरी-मार्च के महीने में शुरू होता है और मई-जून के बीच फल पक जाता है । इसके फूल सफेद होते हैं तथा फूलों की गन्ध जूही के समान होती है।
करौंदे का फल गोल, छोटे कच्चे सफेद लाली युक्त तथा पकने पर और लाल काले पड़ जाते हैं । करोंदा की तासीर गरम होती है।
कच्चे करौंदे का अचार बहुत अच्छा होता है ।
एक विलायती करौंदा भी होता है, जो भारतीय बगीचों में पाया जाता है । इसका फल थोड़ा बड़ा होता है और देखने में सुन्दर भी होता है । इस पर कुछ सुर्खी-सी होती है । आजकल इसी को आचार और चटनी के काम में ज्यादा लिया जाता है।
करोंदा फल के चूर्ण के सेवन से पेट दर्द में आराम मिलता है । करोंदा भूख को बढ़ाता है, पित्त को शांत करता है, प्यास रोकता है और दस्त को बंद करता है । ख़ासकर पैत्तिक दस्तों के लिये तो अत्यन्त ही लाभदायक है।
सूखी खाँसी होने पर करौंदा की पत्तियों के रस का सेवन लाभकरी होता है । गर्मियों में लू लगने और दस्त या डायरिया होने पर इसके फ़लों का जूस तैयार कर पिलाया जाता है, तुरंत आराम मिलता है ।
करोंदा के फल को खाने से मसूढ़ों से खून निकलना ठीक होता है, दाँत भी मजबूत होते हैं ।
करौंदा का प्रयोग एक विशेष विधि द्वारा कर मूंगा व चांदी की भस्म भी बनाई जाती है।
करौंदा को किसान भाई मेंड़ पर लगा सकते है, इस तरह हमें दोहरा फ़ायदा होगा । मेड़ पर करौंदा से आवारा पशुओं से रक्षा होगी साथ ही मेड़ से भी आमदनी होगी ।


No comments:
Post a Comment