दिल्ली चुनाव परिणाम के बारे में कुछ बुद्धिजीवियों की सोच

कुछ बुद्धिजीवियों की दिल्ली चुनाव परिणाम के बारे में यह सोच है कि जाति, संप्रदाय और धार्मिक भेदभाव से ग्रस्त भारतीय जनमानस की सोच इतनी आत्मकेंद्रित है कि वह मुफ्त बिजली , पानी , राशन और मुफ्त शिक्षा तथा स्वास्थ सुविधाएं पाने से आगे कुछ सोच नहीं पाती हैं जबकि आजादी के बाद से देश के सभी नागरिकों के खान पान और रहन सहन का स्तर सुधरा है तथा देश में और भी बहुत सारी उन्नति तथा प्रगति हुई है ।
          यहां एक बात बहुत ग़ौरतलब है कि क्या देश के सभी नागरिकों की उन्नति समान रूप से हुई है कत्तयी नहीं ! एक बार पूर्व प्रधानमंत्री माननीय चरण सिंह से किसी पत्रकार ने पूछा कि आप की निगाह में किसको सबसे अच्छा प्रधानमंत्री माना जाना चाहिए तो उन्होंने कहा कि देखो सभी अपने अपने तरीके से अच्छा काम करते हैं लेकिन सबसे अच्छा वह है जो देश का इसप्रकार से विकास करे जिससे देश में अमीरी और ग़रीबी में बढ़ती आर्थिक असमानताओं को कम से कम किया जा सके । यह सब कैसे संभव है ? जब तक आपके पास पर्याप्त पैसा नहीं है आप कैसे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं कैसे गंभीर रोगों में अच्छा इलाज करा सकते हैं  ?बिजली-पानी एसे सभी का आप समुचित सुविधा जनक करने की हिम्मत नहीं जुटा सकते हैं तो यहीं पर जनमानस सरकार की तरफ देखता है कि उसके पास रोजगार , आय के साधन बढ़े । गरीब किसानों और मजदूरों तथा व्यापारियों की आमदनी बढ़े लेकिन जबतक देश उनके लिए एसे अवसर नहीं दे पा रहा है तब तक उनकी जिन्दगी आसान बनाने के लिए उनको मुफ्त में अच्छी शिक्षा , स्वास्थ , बिजली-पानी देने होंगे । जो लोग इसे मुफ्तखोरी कहते हैं वही वर्ग उस समय शांत रहता है जब अधिकारियों , सांसदों , विधायकों और मंत्रियों को अनावश्यक मुफ्त सुविधाएं मिलती हैं ।

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