शिक्षक कौन

शिक्षक कौन

मिट्टी को जो मूर्त रूप दे,
कुम्भकार वे शिक्षक हैं।

जीवन को जो करे शिल्प,
वे शिल्पकार सब शिक्षक हैं।

गढ़ गढ़ काढ़े खोट हृदय के,
आचार्य प्रवर वे शिक्षक हैं।

दूर करें जो व्यसन व दुर्गुण,
वे हरि जन भी तो शिक्षक हैं।

निर्माण करें द्विज बन कर शिष्य का,
वे सब गुरुजन भी शिक्षक हैं।

सृष्टि के सब जीव जंतु,
जड़ सभी वस्तुएं शिक्षक हैं।

मात पिता गुरु अतिथि आचार्य,
प्रेरक प्रिय परि जन शिक्षक हैं।

जो करें बुराई निंदा मुख,
वे निंदक भी तो शिक्षक हैं।

जो सोचें उन्नति कैसे हो,
वे चिंतक भी तो शिक्षक हैं।

जो भरें प्रेरणा कार्यों से,
वे प्रेरक भी तो शिक्षक हैं।

जब संकट की घड़ियां आवें,
तब मित्र भी होते शिक्षक हैं।

जब हो दुखी निराश बेमन,
सद् आशाएं भी शिक्षक हैं।
जब सूनापन खलता भारी,
हँसता बचपन भी शिक्षक हैं।

जब चहुँ ओर अंधियारा हो,
खुद भी तो खुद के शिक्षक हैं।

जब सूझ न पाए कुछ भी कहीं,
तब परमेश्वर एक शिक्षक हैं।

है नमन मेरा हर शिक्षक को,
शिक्षक के भी हर शिक्षक को।

जिनसे सब पाते विमल बुद्धि,
उस हरि (प्रभु)को हर (प्रत्येक) के शिक्षक को।

हम सब चेतन शिक्षकों- महाशिक्षक परमेश्वर, मातापिता, गुरुजनों, अतिथि, आचार्यों विद्वानों साधु संतों व परस्पर सभी का, प्रकृति के हर एक जड़ पदार्थ का सम्मान कर नमन करने वाले बनें।

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