लोकतंत्र जिंदा है

पीएम यात्राएं कर रहे हैं
पीएम की जगह जज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं,
जज की जगह एंकर फ़ैसला सुना रहे हैं,
ब्रह्मचारी बताते हैं कितने बच्चे पैदा करो,
अभिनेता-नेता बन रहे हैं
और सर्वोच्च नेता (पीएम) अभिनय कर रहे हैं
सरकार के बजाय सवाल विपक्ष से पूछे जा रहे हैं
बलात्कारी आश्रम में मिल रहे हैं
आधार का डाटा लीक हो रहा है और उसकी ख़बर लिखने वाले पर केस हो रहा है
सेना को जगह नहीं मिल रही और सांसदों को जगह-जगह, जगह अलाट हो रही है
अस्पताल में बच्चे मर रहे हैं और नवीनीकरण शौचालयों का हो रहा है
सरकार तानाशाही कर रही है, न्यायधीश बेबस हैं, जनता का एक तबका प्रवक्ता तो दूसरा क़ातिल बना हुआ है।

आप कहते रहिए कि लोकतंत्र ज़िंदा है

बोगस मुद्दा हे लाभ का पद

बकवास और बोगस मुद्दा है लाभ के पद का मामला

हर सरकार तय करती है कि लाभ का पद क्या होगा, इसके लिए वह कानून बनाकर पास करती है। इस तरह बहुत से पद जो लाभ से भी ज़्यादा प्रभावशाली हैं, वे लाभ के पद से बाहर हैं।

लाभ के पद की कल्पना की गई थी कि सत्ता पक्ष या विपक्ष के विधायक सरकार से स्वतंत्र रहें। क्या वाक़ई होते हैं? बात इतनी थी कि मंत्रियों के अलावा विधायक कार्यपालिका का काम न करें, सदन के लिए उपलब्ध रहें और जनता की आवाज़ उठाएं। आप अगर पता करेंगे कि किस राज्य की विधानसभाएं 100 दिन की भी बैठक करती हैं तो शर्म आने लगेगी। सदन चलते नहीं और लाभ के पद के नाम पर आदर्श विधायक की कल्पना करने की मूर्खता भारतीय मीडिया में ही चल सकता है।

जब ऐसा है तो फिर व्हीप क्यों है, क्यों व्हीप जारी कर विधायकों को सरकार के हिसाब से वोट करने के लिए कहा जाता है। व्हीप तो खुद में लाभ का पद है। किसी सरकार में दम है क्या कि व्हीप हटा दे। व्हीप का पालन न करने पर सदस्यता चली जाती है। बक़ायदा सदन में चीफ़ व्हीप होता है ताकि वह विधायकों या सांसदों को सरकार के हिसाब से वोट के लिए हांक सके।

अगर इतनी सी बात समझ आती है तो फिर आप देख सकेंगे कि चुनाव आयोग या कोई भी दिल्ली पर फालतू में चुनाव थोप रहा है जिसके लिए लाखों या करोड़ों फूंके जाएंगे। मीडिया ने इन सब बातों को नहीं बताया, लगे भाई लोग सर्वे कर रिजल्ट ही बताने कि चुनाव होगा तो क्या होगा।

संविधान में लाभ का पद परिभाषित नहीं है। इसकी कल्पना ही नहीं है। इसका मतलब है जो पद लाभ के पद के दायरे में रखे गए हैं वे वाकई लाभ के पद नहीं हैं क्योंकि लाभ के पद तो कानून बनाकर सूची से निकाल दिया जाता है! लोकतंत्र में टाइम बर्बाद करने का गेम समझे आप?

अदालती आदेश भी लाभ के पद को लेकर एक जैसे नहीं हैं। उनमें निरंतरता नहीं है। बहुत से राज्यों में हुआ है कि लाभ का पद दिया गया है। कोर्ट ने उनकी नियुक्ति को अवैध ठहराया है, उसके बाद राज्य ने कानून बना कर उसे लाभ का पद से बाहर कर दिया है और अदालत ने भी माना है। फिर दिल्ली में क्यों नहीं माना जा रहा है?

कई राज्यों में retrospective effect यानी बैक डेट से पदों को लाभ के पद को सूची से बाहर किया गया। संविधान में प्रावधान है कि सिर्फ क्रिमिनल कानून को छोड़ कर बाकी मामलों में बैक डेट से छूट देने के कानून बनाए जा सकते हैं। फोटो क्लियर हुआ ?
 
कांता कथुरिया, राजस्थान के कांग्रेस विधायक थे। लाभ के पद पर नियुक्ति हुई। हाईकोर्ट ने अवैध ठहरा दिया। राज्य सरकार कानून ले आई, उस पद को लाभ के पद से बाहर कर दिया। तब तक सुप्रीम कोर्ट में अपील हो गई, सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार भी कर लिया। विधायक की सदस्यता नहीं गई। ऐसे अनेक केस हैं।

2006 में शीला दीक्षित ने 19 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया। लाभ के पद का मामला आया तो कानू न बनाकर 14 पदों को लाभ के पद की सूची से बाहर कर दिया। केजरीवाल ने भी यही किया। शीला के विधेयक को राष्ट्रपति को मंज़ूरी मिल गई, केजरीवाल के विधेयक को मंज़ूरी नहीं दी गई।

मार्च 2015 में दिल्ली में 21 विधायक संसदीय सचिव नियुक्त किए जाते हैं। जून 2015 में छत्तीसगढ़ में भी 11 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया जाता है। इनकी भी नियुक्ति हाईकोर्ट से अवैध ठहराई जा चुकी है, जैसे दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली के विधायकों की नियुक्ति को अवैध ठहरा दिया।

छत्तीसगढ़ के विधायकों के मामले में कोई फैसला क्यों नहीं, क्यों चर्चा क्यों नहीं। जबकि दोनों मामले एक ही समय के हैं। आपने कोई बहस देखी? कभी देखेंगे भी नहीं क्योंकि चुनाव आयोग भी अब मोहल्ले की राजनीति में इस्तमाल होने लगा है। सदस्यों को अपना लाभ चाहिए, इसलिए ये आयोग के बहाने लाभ के पद की पोलिटिक्स हो रही है।

मई 2015 में रमन सिंह सरकार ने 11 विधायकों को संसदीय सचिव बना दिया। इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं है। न्यू इंडियन एक्सप्रेस में 1 अगस्त 2017 को ख़बर छपी है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सभी संसदीय सचिवों की नियुक्ति रद्द कर दी है क्योंकि इनकी नियुक्ति राज्यपाल के दस्तख़त से नहीं हुई है। दिल्ली में भी यही कहा गया था।

हरियाणा में भी लाभ के पद का मामला आया। खट्टर सरकार में ही। पांच विधायक पचास हज़ार वेतन और लाख रुपये से अधिक भत्ता लेते रहे। पंजाब हरियाणा कोर्ट ने इनकी नियुक्ति अवैध ठहरा दी। पर इनकी सदस्यता तो नहीं गई।

राजस्थान में भी दस विधायकों के संसदीय सचिव बनाए जाने का मामला चल ही रहा है। पिछले साल 17 नवंबर को हाईकोर्ट ने वहां के मुख्य सचिव को नोटिस भेजा है। इन्हें तो राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया है।

मध्य प्रदेश में भी लाभ के पद का मामला चल रहा है। वहां तो 118 विधायकों पर लाभ के पद लेने का आरोप है। 20 विधायक के लिए इतनी जल्दी और 118 विधायकों के बारे में कोई फ़ैसला नहीं? 118 विधायकों के बारे में ख़बर पिछले साल 27 जून 2017 के टेलिग्राफ और टाइम्स आफ इंडिया में छपी थी कि 9 मंत्री आफिस आफ प्रोफिट के  दायरे में आते हैं।

2016 में अरुणाचल प्रदेश में जोड़ तोड़ से बीजेपी की सरकार बनती है। सितंबर 2016 में मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू 26 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर देते हैं। उसके बाद अगले साल मई 2017 में 5 और विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर देते हैं।

अरुणाचल प्रदेश में 31 संसदीय सचिव हैं। वह भी तो छोटा राज्य है। वहां भी तो कोटा होगा कि कितने मंत्री होंगे। फिर 31 विधायकों को संसदीय सचिव क्यों बनाया गया? क्या लाभ का पद नहीं है? क्या किसी टीवी चैनल ने बताया आपको? क्या अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अपराध किया है, भ्रष्टाचार किया है?

क्या 31 संसदीय सचिव होने चाहिए? क्या 21 संसदीय सचिव होने चाहिए? जो भी जवाब होगा, उसका पैमाना तो एक ही होगा या अलग अलग होगा। अरविंद केजरीवाल की आलोचना हो रही है कि 21 विधायकों को संसदीय सचिव क्यों बनाया? मुझे भी लगता है कि उन्हें नहीं बनाना चाहिए था। पर क्या कोई अपराध हुआ है, नैतिक या आदर्श या संवैधानिक पैमाने से?

केजरीवाल अगर आदर्श की राजनीति कर रहे हैं, इसलिए उन्हें 21 विधायकों को संसदीय सचिव नहीं बनाना चाहिए था तो फिर बाकी मुख्यमंत्री आदर्श की राजनीति नहीं कर रहे हैं? क्या वो मौज करने के लिए मुख्यमंत्री बने हैं और लालच देने के लिए संसदीय सचिव का पद बांट रहे हैं?

इसलिए लाभ के पद का मामला बकवास है। इसके ज़रिए दिल्ली पर एक फालतू का मसला थोपा गया है। अव्वल तो इस व्यवस्था और इससे होने वाले कानूनी झंझटों को ही हमेशा के लिए समाप्त कर देना चाहिए।

आपकी संस्थाओं का तमाशा उड़ रहा है। आंखें खोल कर देखिए। टीवी चैनलों के भरोसे देश को मत छोड़िए। पता करते रहिए। देखते रहिए। आप किसी की साइड लें मगर तथ्य तो देखें। यह भी तो देखें कि चुनाव आयोग किसी का टाइपिस्ट तो नहीं बन रहा है।

संसदीय सचिव

बस कुछ ही दिनों के मेहमान
नरेंद्र मोदी के पूर्व मुख्य सचिव और वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त अचल ज्योति ने दिल्ली के 20 विधायकों को संसदीय सचिव बनाये जाने के कारण अयोग्य घोषित किया ।
कारण -- लाभ का पद बताया।
ये बीसों विधायक ₹1/- भी सेलरी नही लेते ना ही बंगला कार जैसी सरकारी सुविधा लेते।
फिर ये लाभ का पद कैसे ??
आइये नजर डालें भारत के और राज्यों के विधायको पर जो संसदीय सचिव बने बैठे हैं।

*पंजाब--
24- संसदीय सचिव--
सैलरी--₹40000/- प्रतिमाह।
*हरियाणा ---
04 संसदीय सचिव--
सैलरी --₹50000/- प्रतिमाह।
*हिमाचल---
02 संसदीय सचिव--
सैलरी--₹65000/- प्रतिमाह।
*राजस्थान---
05 संसदीय सचिव--
सैलरी--₹27000/- प्रतिमाह।
*गुजरात--
05 संसदीय सचिव--
सेलरी--₹27000/- प्रतिमाह
इसके अलावा
छत्तीसगढ मे --11
मणिपुर मे------05
मिजोरम मे-----7
अरूणाचल प्रदेश मे--15
मेघालय मे ----18
नागालैंड मे----24
विधायक संसदीय सचिव बन कर मोटी सेलरी ले रहे हैं।
*सेलरी के अलावा
₹25000/- आफिस खर्च
₹10000/- टेलिफोन खर्च
  यात्रा भत्ता।
कुल मिलाकर एक विधायक को
लाख रूपये महिना तो मिल ही जाता है *साधारण सोचने वाली बात।
दिल्ली के जो 20 विधायक फूटी कौडी सरकार से नही ले रहे वे लाभ का पद लेने के आरोप मे अयोग्य।
और लाख रूपये महिना लेने वाले अन्य राज्यों के विधायक योग्य।

दिल्ली सरकार का तौहफा

दिल्ली सरकार का 2018 (नए साल) का तौहफा

ये हैं वो 40 सेवाएं जिनकी होम डिलिवरी करेगी दिल्ली सरकार-

-अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमाण पत्र
-अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र
-एसटी प्रमाण पत्र
-मूल निवासी प्रमाण पत्र
-आय प्रमाण पत्र
-विलंबित जन्म आदेश
-विलंब मृत्यु आदेश
-लाल डोरा प्रमाणपत्र
-भूमि स्थिति रिपोर्ट
-विकलांग व्यक्ति को स्थायी पहचान पत्र
-आरओआर जारी करना
-साल्वेन्सी (करदानक्षमता) -सर्टिफिकेट
-सर्ववाइविंग सदस्य प्रमाण पत्र
-विवाह पंजीकरण
-नागरिक रक्षा स्वयंसेवी के रूप में -नामांकन
-परिवहन विभाग सेवा
-आरसी एड्रेस चेंज
-वाहन के स्वामित्व का स्थानांतरण
-हाइपोथेफिकेशन एडिशन
-हिप्पेशन समाप्ति
-एनओसी जारी करना
-लर्निंग लाइसेंस
-स्थायी डीएल
-डीएल का नवीकरण
-डुप्लिकेट डीएल
-चेंज ऑफ डीएल का पता
-सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट
-दिल्ली परिवार कल्याण योजना
-वृद्धावस्था पेंशन योजना
-विकलांगता पेंशन योजना दिल्ली -जल बोर्ड सर्विसेज
-नया जल कनेक्शन
-नई सीवर कनेक्शन
-म्यूटेशन
-घर के पुनर्निर्माण के बाद फिर से खोलना
-डिसकनेक्शन

इस प्रणाली में, बायोमेट्रिक मशीन लाभार्थी को पहचान लेगा और किसी विशिष्ट लाभार्थी को दिए जाने वाले राशन की मात्रा के बारे में वेंडिंग मशीन को एक आदेश भेज सकता है. बताया जा रहा है कि यह प्रणाली पीडीएस के माध्यम से राशन के वितरण में चोरी का समाधान करेगी. बायोमेट्रिक सिस्टम लाभार्थी को अपने अंगूठे की छाप, तस्वीर और आधार संख्या के माध्यम से पहचान लेगा, जबकि वेंडिंग मशीन लाभार्थी को आवंटित राशन का वितरण करेगी.

आप राज्यसभा

आप राज्यसभा

देश में राज्यसभा चुनाव 5 सीट पर होने हैं, पर चर्चा सिर्फ़ दिल्ली की तीन सीट को लेकर है , आज से पहले कौन लोग, किस आधार पर राज्य सभा भेजे गए, उन्होंने क्या अपने कर्तव्य निभाए, क्या वह जनता की आवाज़ बने, उस बारे में किसी का कोई सवाल नहीं , इस बात की कहीं ना कहीं बहुत ख़ुशी  भी है , कि इन पदों को  जनता गंभीरता से  लेने लगी है । अरविंद ने कहा था - हम राजनीति करने नहीं , राजनीति बदलने आए हैं ।

पार्टी में लाखों कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने रात दिन लगाकर इस पार्टी को बनाया है , अपने विस्वास को अडिग रखें , अगर पैसों के लिए ही टिकट बेचनी होती तो आज हम एक बहुत अमीर पार्टी होते , देश की राजधानी दिल्ली के मुख्यमंत्री को 50 करोड़ में टिकट बेचने की ज़रूरत नहीं है , अगर उगाही का धंधा चालू रखा जाए तो -

दिल्ली में 1000 से ऊपर प्राइवट स्कूल हैं , जिनमें से कई के लिए अपना काम निकलवाने के लिए एक एक करोड़ पहुँचाना कोई बड़ी बात नहीं , लेकिन आप की दिल्ली सरकार में ऐसे स्कूलों पर लगाम कसी ,

निजी हॉस्पिटल पर लगाम कसी ,

बिजली कम्पनियों पर लगाम कसी ,

जहाँ जहाँ सम्भव हो सका , उगाही पर रोक लगवायी।

यह कहना की पैसों के लिए राज्यसभा टिकट बेची गयी, बहुत ही बेतुकी और बचकानी बात है , पिछली सरकारों की फिरौती प्रथा को चालू रखकर पार्टी को आर्थिक रूप से बहुत महबूत बनाया जा सकता था , लेकिन हमारी सरकार ने इन सबके ख़िलाफ़ बहुत ही मज़बूती से क़दम उठाया , जिसका समर्थन हमारी पार्टी के समर्थक ही नहीं , विरोधी भी करते हैं ।

जहाँ तक सोशल मीडिया में उछल रही बातों का सवाल है , मेरा यह मानना है कि हर फैसले के पीछे बहुत से समीकरण होते हैं, आपको अपने विश्वास पर एक मजबूत विस्वास होना चाहिए, वो विस्वास अगर सोशल मीडिया की कुछ पोस्ट्स, एक टिकट, एक सीट पर ही अगर हिल जाता है, तो कहीं ना कहीं आपको पार्टी और लीडर्शिप पर भरोसा पहले से ही नहीं है ।

पार्टी राज्य सभा सीट में एक्स्पर्ट्स को भेजना चाहती थी, जो मुद्दों पर जनता और पार्टी लाइन पर बुलंद आवाज़ उठा सके, दिल्ली के सरकार में रोज़ रोज़ का केंद्र का हस्तक्षेप किसी से छुपा नहीं है । राज्यसभा की सीट के लिए बहुत से बड़े बड़े एक्स्पर्ट्स को संपर्क किया गया था , अधिकतर ने आज के वातावरण में खुल कर आप के समर्थन में आ पाने में असमर्थता दिखाई, जहाँ तक अपरिचित लोगों को राज्य सभा पहुँचने की बात है , आतिशी, स्वाति जैसे बहुत से लोगों को पहले कोई नहीं जानता था, आज उनके काम के कारण उन्हें जाना जाता है।

यह सच्चाई है की हम एक राजनैतिक पार्टी हैं, और इलेक्शन लड़ना और पूर्ण राज्य में सरकार होना, हमारे लिए बहुत ज़रूरी है । दुनिया भर की सभी ताक़तें जब से यह पार्टी बनी है , इसे रोकने में लगी है , सबकी कोशिश है कैसे इसे विफल किया जाए । आम आदमी पार्टी आम जनता के समर्थन और जुनून  से बनी है , और इसका आगे बडना हमारे और आने वाली पीडियों सभी के भविष्य के लिए ज़रूरी है ।

जान है तो जहान है

एक फेमस हॉस्पिटल में डॉक्टरों की टीम ने पेशंट को तुरंत बायपास सर्जरी करवाने की सलाह दी. पेशंट नर्वस हो गया किंतु तुरंत तयारी में लग गया.
ऐसे वक्त थोडा संयम रखकर सेकंड ओपीनियन लेना ज्यादा ठीक होता.
ऑपरेशन के पहले वाले सारे टेस्ट हो जाने के बाद डॉक्टर की टीम ने बजट बताया, जो की पेशंट को बहुत ज्यादा लगा.
लेकीन "जान है तो जहान है" यह सोचकर वह फॉर्म भरने लगा....व्यवसाय के कॉलम के आगे उसने C.B.I. लिख दिया.
अचानक हॉस्पिटल का वातावरण ही बदल गया. डॉक्टरों की दुसरी टीम चेकअप करने आयी. रीचेकींग हुआ और टीम ने घोषित किया की ऑपरेशन की जरूरत नहीं है. मेडिसिन खाते रहिये ब्लाकेज निकल जायेगा.
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पेशंट "Central Bank of India" का एम्प्लॉई था.

श्री रामचरितमानस की 8 दिव्य चौपाइयां

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